Wednesday, January 9, 2019

इक नदी

इक नदी है
जो भटकती है अटकती है
रुकावटों को झटकती है
झरनों से लटकती है
बोझ तले मिट्टी के
धीरे धीरे सरकती है
मगर बढ़ती है दिन रात
क्यूंकि सागर से मिलना है
सारी की सारी  मेहनत
सारी मशक्कत सारी जद्दोजहद
बस उससे मिल पाने को
मिटा देने को खुद को
और स्वयं सागर हो जाने को

कभी देखा है किसी को
इतना आतुर
स्वयं को ख़त्म करने को
या
स्वयं को पा लेने को 

बिन तराशा पत्थर

ज़िन्दगी की नदी में 
अभी इक बिनतराशा पत्थर हूँ मैं 

पर्वतों से टूटा
सुगढ़ता से वंचित 

ऐने पैने कोने हैं 
रूढ़ि विरुद्ध आकृति 

बेढब सा बे-आकार 
किसी स्थिति सुकर नहीं
 
आने वाले हर एक मोड़ पर ये 
पैने नुकीले कोने , अलग हो जायेंगे 

हर नए उतार चढ़ाव पे 
कुछ कम होगा मेरा खुरदरापन 

परत दर परत 
सरल होता जायेगा मेरा आकार 

हों जाऊं शायद 
सुयोग्य, उपयुक्त, रूढ़ि-परक 

पर खो भी दूंगा बहुत कुछ 
जरुरी - गैर जरुरी 

और यूँही धारा के साथ बहते बहते 
नित नए रूप में  ढलते ढलते 

जब तलक आएगा ठहराव 
रेत हो जाऊंगा 

आना कभी इलाहाबाद 
मिलूंगा वहीँ नदी किनारे 
गंगा की रेती में .... 


Monday, August 13, 2018

भटकने की आदत है

कदम दो चार चलता हूँ, कि खो जाता हूँ 
गोया चलने से ज्यादा भटकने की आदत है 

जब भी दिल की कहता हूँ मुसीबत हो ही जाती है 
मेरे लफ़्ज़ों को जेहन में खटकने की आदत है 

सुन लूँ जो मन की तो मंजिलों से दूर जाता हूँ 
इसे हर एक चौराहे पे अटकने की आदत है 

जहाँ मुश्किल नहीं होती मुझे मुश्किल वहीं होती 
आसां हों जो इम्तेहां उनमे लटकने की आदत है 

ये हम-राह हम-मंजिल हम-सफर सब ठीक है लेकिन 
कोई जब कसके पकड़े हाथ झटकने की आदत है

Tuesday, April 10, 2018

हौसला

तू अपने दिल में हारने का भी हौसला रख 
जीत शर्तिया हो तो कोई जांबाज़ नहीं बनता 
ना कर तूफ़ान से थम जाने की गुजारिश 
साहिल पे बैठे कोई सिंदबाद नहीं बनता

Sunday, April 8, 2018

रात

आँख खोले रातों में सोते हुये 
स्याह से सपने संजोते हुये 
काले आसमां के धागे
उँगलियों पर लपेटते हुए 
रात की स्याही को
खुद में समेटते हुए 
एक अंधेरी सी सुबह में 
जागने की उम्मीद है, 
धुंधला सूरज काली धूप 
एक उदासीन धूमिल सा दिन 
और फिर वही रात
वही अधूरी नींद है  I 

तुम्हे प्यार करना ज़रूरी है

महज़ कहने को नहीं कहता
आजकल महसूस हूँ ये करता
ज़िन्दगी तुम बिन अधूरी है
तुम्हे प्यार करना ज़रूरी है

चाह  कर भी खफा हो नहीं सकते
गर हुए खफा, चैन से सो नहीं सकते
हो जाऊं खफा तुमसे, लगे यूँ
की खुद से भी दूरी हैं
मेरी जाना तुम्हे प्यार करना ज़रूरी है

रोज़ नज़दीकियों के
ख़याल बुनता हूँ,
जो बातों में  तुमने कहीं  नहीं
वो सारी बात सुनता हूँ,
ये जो फासले हैं
इश्क़ की मज़बूरी हैं
पर मेरी जाना तुम्हे प्यार करना ज़रूरी है 

Wednesday, July 5, 2017

ठंडी चाय

कभी मुड़ जाएँ जो कदम
इन गलियों को तरफ
तो रुख,
उस घर का भी कर लेना
जहाँ, मेज़ पर तुम्हारी
ठंडी चाय रखी है,
जिसे वहां छोड़
तुम निकल गए बिना बताये
और इंतज़ार में चाय
पड़ी रही परतें जमाये,

कभी जो रुख़ करना
इस घर का तो
कोशिश करना चाय
गर्म करने की, पीने की
हालाँकि स्वाद वैसा
रहेगा नहीं,
न पी सको तो
फेंक ही देना चाहे,

गलत ही सही पर,
इक फैसला कर लेना
अच्छा होता है.