Friday, March 2, 2012

बिन कहे

लफ्ज़ नाकाफी हैं कहने को
न मैं कुछ कहता हूँ
न तुम कुछ कहते हो
फिर भी क्या बात है देखो
तुम भी समझ गए
हम भी समझ गए  

Sunday, January 8, 2012

धारणा

मैं न ही  जानता हूँ
न ही पहचानता हूँ
पर मैंने ये जाने क्यों मान लिया
तुम वो ही हो जो मैं सोचता  हूँ

तुम को जाने बिना
एक ख्याल गढ़ लिया
और मानता हूँ  की
तुम वैसे हो जैसा मैं समझता हूँ

कितना गलत था मेरा ये सोचना
यूँ आवरण को देख भीतर को परखना
फिर बेवजह की एक धारणा बनाना
तुम वही हो जो मैं सोचता हूँ

Thursday, December 29, 2011

जिंदगी के मजे नादानियों में हैं

जिंदगी के मजे नादानियों में हैं
धमा चौकड़ी , खेल खिलौने 
और नानी की कहानियों में है 

हूँ मैं मैं गंभीर और जिम्मेदार भी 
सजग भी हूँ और तैयार भी 
पर मन तो शैतानियों में है
जिंदगी के मजे नादानियों में हैं 

जानता हूँ मैं वक्त की अहमियत को 
मानता हूँ पाबंदियों को 
पर दिल तो लापरवाहियों में है
जिंदगी के मजे नादानियों में हैं 

ना करू गर नादानियाँ तो
जिंदगी के मायने क्या हैं
हर पल को जीना है मुझे
अगले पल न जाने क्या है 

Wednesday, December 7, 2011

आगे निकल आया हूँ मैं

दिल को अज़ीज़ थे जो सपने
तोड़ आया हूँ  मैं
अपनी यादों को पीछे कही
छोड़ आया हूँ मैं
एक वक्त था की तू ही थी
 मंजिल मेरी .......
 ......................
अब अपनी राहें
मोड़ आया हूँ मैं

 

Monday, September 19, 2011

कुछ नहीं

क्या करना है  क्या होना है 
किसको क्या पता है यहाँ 
अपनी तो  जिन्दगी जा रही है 
ये राहे ले जाए जहाँ ....

हिस्से हिस्से में बँट  रहे ख्वाबो को 
जोड़कर इक तस्वीर बनाता हूँ  
फिर टुकड़े टुकड़े कर उसके 
यूँ ही मुस्कुराता हूँ  

शायद ख्वाबो का यही होना है
हर पल बस नए सपने संजोना है
हर कोई यहाँ खिलौना है 
न कुछ पाना है ना कुछ खोना है 


गर मजा आता है छोड़ कर जाने में तुम्हें
मेरी यादों को तनहा छोड़ जाओ तुम

Sunday, September 4, 2011

लम्हे

ठहरी हुई जिन्दगी में
लम्हे यूं गुजर जाते हैं  
हाथों से रेत  की तरह
फिसल जाते हैं
रोकना तो चाहा बहुत मगर
 ये तो बादल हैं
बस उड़ते ही चले जाते हैं

लम्हों को खुल के जीना
हमने सीखा ही नहीं
जिन्दगी की राह पर  
सर को झुकाए चले जाते हैं

  बेहिसाब लम्हे यूँ ही
गुजरते गए 
सिवाय उस लम्हे के
जिसमे हम तुम साथ थे 
और वो याद बन गया.....