मेरी ज़ुबान
भटक जाता हूँ हर मोड़ पर, अजनबी सी हैं ये गलियाँ l इक तो लीक नयी मेरी, उसपर अन्जान शहर तेरा l
Monday, April 23, 2012
मुखौटा
यूँ चेहरे पे चेहरा लगाया है
की खुद को सभी से छुपाया है
जमाना कुचल देता एक मासूम को
मुखौटे ने ही इसको बचाया है !!!.......
Friday, March 2, 2012
हर घड़ी ! हर लम्हा !
तुम्हारे साथ बिताये थे जो पल
यूँ तो बीत गए
पर गुजरते गुजरते कहीं
मुझे अन्दर तक रीत गए
जाना तुम्हारा छोड़कर ऐसे
जबकि तुम्हारे बिन मैं रहा नहीं
ये एक नया दौर है वक्त का
तो चलो यूँ ही सही
सोचकर तुम जो चले जाओगे
लगा की आँखे भर आएँगी
जीता था साथ तुम्हारे
तुम बिन धड़कने थम जाएँगी
पर जब तुम यहाँ नहीं हो
जाने क्यों कमी ये नहीं खलती
वक़्त थमा कुछ देर तक पर
जिन्दगी वैसे ही चल दी
शायद अपना रिश्ता ही ऐसा है
की अब मैं नहीं हूँ तनहा
दूर हो तुम पर पास हो मेरे
हर घड़ी ! हर लम्हा !
बिन कहे
लफ्ज़ नाकाफी हैं कहने को
न मैं कुछ कहता हूँ
न तुम कुछ कहते हो
फिर भी क्या बात है देखो
तुम भी समझ गए
हम भी समझ गए
Sunday, January 8, 2012
धारणा
मैं न ही जानता हूँ
न ही पहचानता हूँ
पर मैंने ये जाने क्यों मान लिया
तुम वो ही हो जो मैं सोचता हूँ
तुम को जाने बिना
एक ख्याल गढ़ लिया
और मानता हूँ की
तुम वैसे हो जैसा मैं समझता हूँ
कितना गलत था मेरा ये सोचना
यूँ आवरण को देख भीतर को परखना
फिर बेवजह की एक धारणा बनाना
तुम वही हो जो मैं सोचता हूँ
Thursday, December 29, 2011
जिंदगी के मजे नादानियों में हैं
जिंदगी के मजे नादानियों में हैं
धमा चौकड़ी , खेल खिलौने
और नानी की कहानियों में है
हूँ मैं मैं गंभीर और जिम्मेदार भी
सजग भी हूँ और तैयार भी
पर मन तो शैतानियों में है
जिंदगी के मजे नादानियों में हैं
जानता हूँ मैं वक्त की अहमियत को
मानता हूँ पाबंदियों को
पर दिल तो लापरवाहियों में है
जिंदगी के मजे नादानियों में हैं
ना करू गर नादानियाँ तो
जिंदगी के मायने क्या हैं
हर पल को जीना है मुझे
अगले पल न जाने क्या है
Wednesday, December 7, 2011
आगे निकल आया हूँ मैं
दिल को अज़ीज़ थे जो सपने
तोड़ आया हूँ मैं
अपनी यादों को पीछे कही
छोड़ आया हूँ मैं
एक वक्त था की तू ही थी
मंजिल मेरी .......
......................
अब अपनी राहें
मोड़ आया हूँ मैं
Monday, September 19, 2011
कुछ नहीं
क्या करना है क्या होना है
किसको क्या पता है यहाँ
अपनी तो जिन्दगी जा रही है
ये राहे ले जाए जहाँ ....
हिस्से हिस्से में बँट रहे ख्वाबो को
जोड़कर इक तस्वीर बनाता हूँ
फिर टुकड़े टुकड़े कर उसके
यूँ ही मुस्कुराता हूँ
शायद ख्वाबो का यही होना है
हर पल बस नए सपने संजोना है
हर कोई यहाँ खिलौना है
न कुछ पाना है ना कुछ खोना है
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