Monday, August 13, 2018

भटकने की आदत है

कदम दो चार चलता हूँ, कि खो जाता हूँ 
गोया चलने से ज्यादा भटकने की आदत है 

जब भी दिल की कहता हूँ मुसीबत हो ही जाती है 
मेरे लफ़्ज़ों को जेहन में खटकने की आदत है 

सुन लूँ जो मन की तो मंजिलों से दूर जाता हूँ 
इसे हर एक चौराहे पे अटकने की आदत है 

जहाँ मुश्किल नहीं होती मुझे मुश्किल वहीं होती 
आसां हों जो इम्तेहां उनमे लटकने की आदत है 

ये हम-राह हम-मंजिल हम-सफर सब ठीक है लेकिन 
कोई जब कसके पकड़े हाथ झटकने की आदत है

Tuesday, April 10, 2018

हौसला

तू अपने दिल में हारने का भी हौसला रख 
जीत शर्तिया हो तो कोई जांबाज़ नहीं बनता 
ना कर तूफ़ान से थम जाने की गुजारिश 
साहिल पे बैठे कोई सिंदबाद नहीं बनता

Sunday, April 8, 2018

रात

आँख खोले रातों में सोते हुये 
स्याह से सपने संजोते हुये 
काले आसमां के धागे
उँगलियों पर लपेटते हुए 
रात की स्याही को
खुद में समेटते हुए 
एक अंधेरी सी सुबह में 
जागने की उम्मीद है, 
धुंधला सूरज काली धूप 
एक उदासीन धूमिल सा दिन 
और फिर वही रात
वही अधूरी नींद है  I 

तुम्हे प्यार करना ज़रूरी है

महज़ कहने को नहीं कहता
आजकल महसूस हूँ ये करता
ज़िन्दगी तुम बिन अधूरी है
तुम्हे प्यार करना ज़रूरी है

चाह  कर भी खफा हो नहीं सकते
गर हुए खफा, चैन से सो नहीं सकते
हो जाऊं खफा तुमसे, लगे यूँ
की खुद से भी दूरी हैं
मेरी जाना तुम्हे प्यार करना ज़रूरी है

रोज़ नज़दीकियों के
ख़याल बुनता हूँ,
जो बातों में  तुमने कहीं  नहीं
वो सारी बात सुनता हूँ,
ये जो फासले हैं
इश्क़ की मज़बूरी हैं
पर मेरी जाना तुम्हे प्यार करना ज़रूरी है 

Wednesday, July 5, 2017

ठंडी चाय

कभी मुड़ जाएँ जो कदम
इन गलियों को तरफ
तो रुख,
उस घर का भी कर लेना
जहाँ, मेज़ पर तुम्हारी
ठंडी चाय रखी है,
जिसे वहां छोड़
तुम निकल गए बिना बताये
और इंतज़ार में चाय
पड़ी रही परतें जमाये,

कभी जो रुख़ करना
इस घर का तो
कोशिश करना चाय
गर्म करने की, पीने की
हालाँकि स्वाद वैसा
रहेगा नहीं,
न पी सको तो
फेंक ही देना चाहे,

गलत ही सही पर,
इक फैसला कर लेना
अच्छा होता है.

बातें तेरे बारे में

हंस के मिलता हूँ जुलता हूँ
महफ़िलों में घुलता हूँ
हर किसी से करता हूँ
बातें तेरे बारे में,

चलता हूँ तो जैसे उड़ता हूँ
यूँ ही बेवजह सा फिरता हूँ
आजकल हर शय से सुनता हूँ
बातें तेरे बारे में,

बेवक़्त कागज़ों पे बिखरता हूँ
हर्फ़ हर्फ़ क़रीने  से संवरता हूँ
मीर की ग़ज़लों सी कहता हूँ
बातें तेरे बारे में,

खुद में तुमसा ही रहता हूँ
एक धार में दो नदी सा बहता हूँ
दोनों में फर्क नहीं, पर समझता हूँ
सब हैं, बातें तेरे बारे में,

ये रास्ते सारे ख्वाब के
और सपनों की गलियां सभी
तुम्हारी ओर मुड़ी हैं
घर बार दुनिया जहान की बाते सभी
यूँ तो तुमसे नहीं
पर तुमसे ही जुडी हैं। 

Monday, April 10, 2017

कैसे कहूँ मैं कौन हूं

कैसे कहूं मैं कौन हूं?
कि कई रूप हैं मेरे
अलग लोग, अलग संगत
वैसा ही अलग अलग मैं भी
मानो एक आईना  हूँ
तुम्हारी  मेरे प्रति अपेक्षा का
कि तुम्हारी अवधारणा बदलने को
बदलता हूं मैं.
इसी बदलाव की उथल पुथल में
खुद सा ना रहा  हूँ
कैसे कहूँ  मैं कौन हूँ ?

ढलता हूं नित नये आकार में
आयाम बदलता हूं व्यवहार के
जिसने जैसा चाहा
वैसा होता रहा हूं
हां मगर थोड़ा थोड़ा
खोता रहा हूँ
सर्वमान्य सम्पूर्ण होने की चाह में
अधूरा सा होता रहा हूँ
कहो कैसे कहूँ मैं कौन हूं?

दूसरों के तराजू में
अपना वजूद तौलता हूँ
और नापने को मन की गहराई
मापने उधार के लूंँ
तुम्हारे अनकहे नियम और शर्तों पर
खुद की संरचना करता हूँ
भिन्न-भिन्न दिशानिर्देशों पे चल
अपने मन को गढ़ता हूँ
पर होना कुछ अलग सा चाहूं
कहो कैसे कहूँ मैं कौन हूं?