Wednesday, September 21, 2016

प्रश्न

कहा तुमने
जो सत्य है
उसका पालन करो

जो धर्म है
उसको धारण करो

जीवा सत्कर्मों पर
अर्पण करो

परंतु सब कुछ
जीवन /मृत्यु
धर्म /अधर्म
सत्य/असत्य
जैसा स्पष्ट तो नहीं

अक्सर मोड़ ऐसे आते हैं
जो दिशाओं के बीच से जाते हैं

वहां क्या परिभाषा हो
इन मूल्यों की ??

अँधेरा उजाला घुल जाए अगर
किस रंग रंगे ये मन ??

मैं

मेरी शख्सियत मेरा वज़ूद
सब बेमानी है
तुमने जैसा देखा मुझे
समझा मुझे, जाना मुझे
मेरे होने का सबूत बस वही कहानी है

मैं क्या सोंचता हूँ, के मैं क्या हूँ
कुछ असर नहीं रखता,
मैं जैसा रहा, जो मैंने किया
तुम्हारी आँखों में
तस्वीर वही रह जानी है

हर कोई जानता है मुझको
अलग तरह से
जैसे हज़ार इंसान हों एक मुझमे
एक पत्थर की लहरे हों जैसे कई सारी
मगर दर असल तो सब पानी है

मेरी शख्सियत मेरा वज़ूद
सब बेमानी है

दो लोग

दो लोग एक हो भी जाएँ बेशक
फिर भी दो रहना ज़रूरी है
जो नज़दीकियों की हद है
वो ये दूरी है

चिराग अलग अलग हो सबके
बस घर में रौशनी एक रहे
आँधियों का क्या भरोसा
दिया एक ही हो ऐसी भी क्या मज़बूरी  है 

Wednesday, March 9, 2016

एक राष्ट्र - एक परिवार

हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई,  सब कड़ियाँ इक ज़ंज़ीर की
अतरंगे सब रंग निराले,  भारत के तस्वीर की
बढ़ें प्रगति की राह पर,  जो चले हाथों में ले हाथ
जाती धर्म के द्वेष भुलाकर, कदम बढ़ाये साथ साथ

सात सुरों का राग बनाकर,  क्यों न इक स्वर में गा लें हम
एक ही माँ के सब बेटे हैं,  आओ एक दूजे को अपना लें  हम
रेशा रेशा जो बिखरा बिखरा,  समय की धूल में खो जाएगा
गूंथ गूंथ कर हर धागे को, अखंड सूत्र बना ले हम

रंग बिरंगे फूल हैं सारे मिलकर उपवन महकायेंगे
कतरा कतरा साथ में बहके सागर बन जायेंगे हम
असंख्य भुजाओं का एक हाथ बने, जो हम सारे साथ चलें
वेदों के ज्ञाता विश्व गुरु हैं, विश्व शक्ति भी बन जायेंगे हम

इस धरा पे रहेगा अपना कोई दुश्मन शेष नहीं
पवित्र पावन इस घर में गर रहे कोई क्लेश नहीं
सर्वधर्म समभाव ही उज्जवल भविष्य की नींव है
ईंट से ईंट जोड़ सुदृढ़ एक दीवार बन जायेंगे हम

रहे भरोसा सबको सबपर ऐसा  माहौल  बनाना है
एक राष्ट्र के वासी हैं, हमें एक परिवार बनाना है।



Sunday, February 21, 2016

तलाश

जो हाथों में है आगोश में है
वो कहाँ दिल के पास है
और जो निगाहों में हैं जुनूँ में है
ना जाने क्या है जिसकी तलाश है

हर ठौर बढ़ती जा रही
हर कदम नयी सी प्यास है
हर शय किसी नयी मंज़िल का साया
फिर भी दिल उदास है

फासलों में नज़दीकियों को तरसते थे
पास आके दूरियों की तलाश है
अजीब है ये दस्तूर-ए -ज़िन्दगी भी
जो मिल गया फिर कहाँ वो ख़ास है

हर मंज़िल इक नयी मंज़िल का रास्ता है
मिलेगी औ बिसर भी जाओगे जिसकी आस है
सुकूं में बैठा हु आज तो लगता है
हमे इक नए दर्द की तलाश है 

Saturday, February 20, 2016

मर गया बेचारा सपना

जंजीरो से बाँध बाँध कर क्यों गला घोंट रहा अपना ??
अब भी वक्त है , नब्ज़ पकड़
देख हो सके ज़िंदा हो वो सपना,

इतना तो याद है काफी दूर तक साथ आया था
बचपन की गलियों में तुझे हँसता देख
वो भी मुस्काया था
तब भी वो डरा सहमा रहा खड़ा
जब तूने दो दूनी चार समझाया था

पर फिर तू दुनिया के बाजार की तरफ मुड़ गया
खुद को बेंच ख़ुशी खरीदना चाहते थे
खरीद फरोख्त के चक्कर में
उसको कैसे कैसे डर सताते थे

तुम्हे भी कहां परवाह थी
तुम तो खरीददार ढून्ढ रहे थे
अपनी ज़िन्दगी के
पुकारा भी था उस सपने ने तुम्हे
मगर आवाज़ दबा दी
भविष्य के जहरीले सांप दिखा के

अंदर ही अंदर तुम भी चाहते थे उसे
शायद उतना ही
मगर अपनाने से कतराते रहे
आज़माते रहे दूसरा और सब कुछ
डरते थे शायद या डरते हो आज भी
मगर किस्से ?? मगर क्यूँ ??
इन बाज़ार वालों से?? या, अपनों की आँखों से ??
खैर, तुमने ये सब सोंचा कहा??

सब बिक गया अब शायद कुछ बचा नही
या जो बचा है वो किसी काम का नहीं
जब सब दिए बुझ गए तब तू सोंचता है
कि जंजीरो में बांध - बाँध  क्यों घोटा गाला अपना
पर अब शायद देर हो गयी
मर गया बेचारा सपना।   

Saturday, December 5, 2015

दरख़्त

झांकते हैं दरख़्त
रोज़ खिड़की से मेरी,
चलो कोई तो है हमदम मेरा
वरना किसकी ज़िन्दगी में शामिल कौन है

लिबास डाल कर निकलते हैं
इज़्ज़तदार जो ठहरे
एहसासों की नुमाइश करे
जमाने में ऐसा ज़ाहिल कौन है

रोते हुए दुबके रहें
हर दिल के कोने में
मिल जाते हैं सबको ये
पर इन  ग़मों को हासिल कौन है

रात भटकती रही रात भर
लहरों की थपकियों से जागने को
ज़िन्दगी की कश्तियाँ तैरती डूबती रहीं
ना जाने इस समंदर का साहिल कौन है

झांकते हैं दरख़्त
रोज़ खिड़की से मेरी,
चलो कोई तो है हमदम मेरा
वरना किसकी ज़िन्दगी में शामिल कौन है