Sunday, August 10, 2014

अस्तित्व

मैं क्या हूँ ?
मैं क्या कहूँ ....... 
कुछ ख़ास रंगों से 
खींचा गया एक चित्र,
जो मेरा नाम सुनते ही 
तुम्हारे मस्तिष्क पटल पर 
उभर आया है, 
या एक अवधारणा मात्र ,

याद है जब पहली बार 
तुमने अपनी गहरी आँखों में 
मेरी एक टेढ़ी -मेढ़ी परछाईं बनायी थी 
उस कुरेद कर बनाये चित्र को 
सुधारता रहा मैं जाने अनजाने 
कुछ अपने कर्मों से 
कुछ तुम्हारी सोंच से 
पर अब भी उस परछाई 
का एक टुकड़ा वैसा का वैसा ही है 

और मैं वही एक छाप हूँ 
तुम्हारे ह्रदय पे 
जिसे रोज़ाना थोड़ा-थोड़ा 
बदलता हूँ 
शायद मेरे अस्तित्व  का, 
मेरे जीवित होने  का, 
संकेत यही है ....... 

 

Sunday, January 26, 2014

आवाज़ उठा के तो देख

बैठ न यूँ थक-हार के
बदलेगा मंज़र कदम बढ़ा के तो देख,

तलवार उठाना कोई ज़रूरी तो नहीं
पलट जायेंगे तख़्त,
आवाज़ उठा के तो देख,

क्यूँ चुनते रहें गद्दारों और दलालों को
मिलेगा नेता हमें,
तू भीड़ के आगे आके तो देख,

भरोसे न रह अपने  हुक्मरानों के
मरेगी भुखमरी भी,
भूखे को रोटी खिला के तो देख,

खामियां हैं बुराइयां हैं रहना है यहाँ मुश्किल बहुत
देश सुधर जाएगा,
अपनी जिम्मेदारियां निभा के तो देख.

तलवार उठाना कोई ज़रूरी तो नहीं
पलट जायेंगे तख़्त,
आवाज़ उठा के तो देख,


ज़िन्दगी

कुछ गुजरे हुए नाज़ुक लम्हे
एक-आध गुनगुनी सी याद, है ज़िन्दगी !
माँ के होंठों का स्पर्श माथे पर
यारों की चुलबुली सी बात, है ज़िन्दगी !

बैठे रहना घंटों ठंडी धूप में
और बस यूँ ही खो जाने का एहसास, है ज़िन्दगी !
तेरे ना होने पर जो खो जाए
और जो तू  पास हो तो पास, है ज़िन्दगी !

हज़ारों बेवजह बीत रहे लम्हों के दरम्यां
तेरी एक बेपरवाह मुस्कान, है ज़िन्दगी !
कुछ दुनियादारी का जीता-जागता इल्म
कुछ वही घिसा-पिटा किताबी ज्ञान, है ज़िन्दगी !

जाने कितने पसंदीदा गानों कि धुनें
कुछ किस्से जो ना आयें रास, है ज़िन्दगी !
सब कुछ तो बस यूँ ही रहा
और जो थोडा बच गया वो 'खास', है ज़िन्दगी !

मिलते तो रहे हज़ारों से उम्र भर
पर मुझसे मेरी मुलाकात, है ज़िन्दगी !
रास्तों के कहकहे या मंज़िलों कि ख़ामोशी
रहे जो हरकदम साथ, है ज़िन्दगी !

कुछ गुजरे हुए नाज़ुक लम्हे
एक-आध गुनगुनी सी याद, है ज़िन्दगी !

उदासी

क़तरा क़तरा यूँ आँखों से हसरत
अश्क़ के संग बह गयी
खाली -खाली इस मकां में
बस उदासी रह गयी

लफ्ज़ भी जो नाकाम रहें
हालत मेरी बयां करने को
वो शाख से टूटे हुए
पत्ते कि ज़ुबानी कह गयी 

सात समंदर पार कि
ख्वाहिश लिए बैठा था मैं
जो मंज़िल मेरी उस पार थी
उस पार ही रह गयी

जो भी मेरे दिल में था
मैंने तुझपे मढ़ दिया
पीर बेशक़ मेरी थी
ना जाने तू क्यूँ सह गयी

अपनी हर नाकामी का आखिर
मैं ही तो जिम्मेदार हूँ
जो दूजों ने करी, जो गैरों ने कही
वो बात पुरानी बह गयी


Saturday, September 21, 2013

आज मन मेरा उदास है

जाने क्यूँ इसे कुछ भाये ना
बेचैन है सुकूं आये ना
जाने किस बात से नाराज़ है
आज मन मेरा उदास है।

पर साथ जब सब दोस्त यार हैं
खुशियों के मौके भी बेशुमार हैं
फिर क्या है ??…. क्यों निराश है
आज मन मेरा उदास है।

किस्मत  को भी अपनी आजमा लिया है
जो भी चाहा था पा लिया है
फिर क्या जिसकी इसे आस है
आज मन मेरा उदास है।

कोई भी मेरा मुझसे जुदा नहीं
खफा इतना भी मुझसे खुदा नहीं
प्यारे मुझको जो, सब आस पास हैं
फिर क्यूँ  आज मन मेरा उदास है।

मन मेरे ऐसी भी क्या मुश्किल है
कौन है ऐसा जिसको सब कुछ ही हासिल है
चलने को दुनिया में कितने ही रस्ते हैं
हार के भी सबकुछ, फिर भी लोग हँसते हैं।

सोंच जरा उनके बारे में
जिनके तुझसे बुरे हालात हैं
फिर देख जरा जीवन को अपने
क्या-क्या नहीं तेरे पास है

बस तू मन में फिर से नयी एक उमंग भर
उदासी पर चटख इक नया रंग भर
उत्साह के गीतों से बुझा ले
जो भी तेरी प्यास है
ताकि फिर कभी मैं न कहू
आज मन मेरा उदास है। 

Sunday, September 15, 2013

योद्धा

कठोर कठिन दुर्गम पथ है
माना की जर्जर मेरा रथ है
झुका नहीं हूँ मैं अभी भी, यद्यपि
शरीर स्वेद-रक्त  से लथपथ है

जीवन रण के इस परम सत्य को
हाँ मैंने स्वीकारा है
शक्ति नहीं सामर्थ्य बल पर
रिपुदल को ललकारा है

अस्तित्व के इस यथार्थ युद्ध का
दृढ़ निश्चय ही प्राण तत्व है
कर्म पूर्ति की विषम राह पर
वीरगति ही अमरत्व है।

Wednesday, September 11, 2013

तो फिर बात क्या है

क्या मैं कहूँ की जमाने के हालात क्या हैं
इन्सां हूँ मैं, मुझसे पूछो मेरे जज़्बात क्या हैं 
मिले कोई मुझसे न देखे  मेरा मज़हब, जात क्या है 
हो सके ग़र ये तो फिर बात क्या है। ….