Tuesday, August 13, 2013

फिर फिर सावन आएगा

फिर सावन आया है
फिर मेंढक टर्रायेंगे 
खादी पहन कर भेड़िये 
मेमनों को दुलराएंगे
देश की दुर्गति करने वाले
शान से तिरंगा फहराएंगे
लूट के देश की सुख-संपदा
गीत राष्ट्र -भक्ति के गायेंगे,
भूखी जनता जब कोसेगी
वादों के लड्डू खिलाएंगे
माँ बहन की कसमे खायेंगे
कि, गरीबी (गरीबों ) को मिटायेंगे
स्विस बैंक में नए अकाउंट खुलवायेंगे,
फिर सीमा पार गीदड़ गुर्रायेंगे
और पिंजड़े में बंद शेर हमारे
खादी के कारण मारे जायेंगे,
एक बार फिर पक्ष विपक्ष
जनता को उल्लू बनायेंगे
ऊपर ऊपर झगड़ेंगे
भीतर भीतर माल दबायेंगे,
. .
..
काँधे पे ले अपनी छोटी सी दुनिया
हम फिर  अपना दुखड़ा गायेंगे
बड़े लोग हैं, सब कर सकते हैं
हम आखिर क्या कर पायेंगे

पर अगर आज भी नहीं जागे .....

फिर फिर सावन आएगा
फिर फिर मेंढक टर्रायेंगे
खादी पहन कर भेड़िये 
एक बार फिर मेमनों को चबायेंगे 

Wednesday, July 31, 2013

मायने

जब तक मेरे जेहन   रहा
तू ज़ज्बात बन कर रहा
जुबां तक पहुँचते पहुँचते
 लफ्ज़ बन गया
होठों के रास्ते निकला जो
अल्फाज़ बन हवा में उड़ता फिर रहा
तेरे कानों तक पंहुचा तो
एक आवाज़ हो गया
रिस रिस कर ये जो
तेरे दिल-ओ-दिमाग में भर रहा
तो एक ख्याल हो गया
पर,……
वहां मायने  बदल गए
वहां मतलब बदल गए
तूने शक्ल इक नयी इख्तियार की
कही वो जो मैंने कही ना बात थी
और अब हर इक बात का
सबब तू बन रहा
पर तू तो बस एक ज़ज्बात था
मासूम, निरपराध सा
अब न जाने तू
क्या से क्या बन रहा …

मुकम्मल की तलाश थी
हाथ कुछ भी न आया है
आफताब  की आरज़ू  में
चिराग भी गवाया है 

अख़बार की खबर

मैं हर रोज पैदा होता हूँ
मैं हर रोज मारा जाता हूँ
कभी सीने से लगाया जाता हूँ
कभी टुकड़े टुकड़े फाड़ा जाता हूँ
कुछ कुछ मैं बनता जाता हूँ
कुछ कुछ मैं मिटता जाता हूँ
सुबह को धूप  हूँ तो
रात को अँधेरा बन जाता हूँ
छोटी सी ज़िन्दगी मेरी
छोटा सा मेरा सफ़र
मानो मैं हूँ कोई. …… अख़बार की खबर !

Wednesday, May 15, 2013

कल्पवास ख़त्म हुआ

कल्पवास अब ख़त्म हुआ
चल आगे , आगे चलना है
जोगी बन बढ़ता जा प्यारे
सूरज सा उगना- ढलना है

कल्पवास अब ख़त्म हुआ
चल आगे , आगे चलना है

रुकना चाहेगा ये लाख मगर
पागल मन को इतना समझा देना
ठहरा जो पानी सड़ जायेगा
तुझको तो निर्मल गंगा सा बहना है

कल्पवास अब ख़त्म हुआ
चल आगे , आगे चलना है

छूट रहा जो पीछे तेरा
स्मृतियाँ हैं भविष्य नहीं
पाँव पकड़ न रोके यादें
दृढ़ निश्चय ऐसा करना है

कल्पवास अब ख़त्म हुआ
चल आगे , आगे चलना है

जो समय गुजर तूने यहाँ पे
उससे बड़ी कोई बात नहीं
शायद ही कोई लम्हा ऐसा हो
जिससे जुडी तेरी याद नहीं
बाँध के इन सब यादों की गठरी
निश्चय पथ पर फिर बढ़ना है

कल्पवास अब ख़त्म हुआ
चल आगे , आगे चलना है


गुरु मंत्र मिला है जो भी तुझको
देखो उसको भूल न जाना
मशाल मिली है जो हाथों में
जग रौशन उससे करना है
 कल्पवास अब ख़त्म हुआ
चल आगे , आगे चलना है


जोगी बन बढ़ता जा प्यारे
सूरज सा उगना- ढलना है

कल्पवास अब ख़त्म हुआ
चल आगे , आगे चलना है






Tuesday, May 14, 2013

शाम की दास्तां



दिन तो फिर दिन है
रात की अपनी बात है
इन दोनों के जो दरमयान
दिलकश सी एक शाम है

ना धूप सी ये जलती है
ना अँधेरे सी खलती है
मद्धम मद्धम आंच है
दिये सी ये जलती है

दिल में कुछ सुकूं -सुकूं
सा हो जाये
शहद सा आँखों में घुलती है
हर रोज शाम मुझे यूँ ही मिलती है

और आज भी .....

शाम गहरा रही है
हर मंजर है धूमिल- धूमिल
लाल- लाल आँखें सूरज की
नींद से बोझिल- बोझिल .........


Monday, May 13, 2013

यादें जो छूटती नहीं

दुपहरिया की धूप हो 
या आधी रात का अँधेरा 
बिना किसी शर्त के 
तुम लोगो ने साथ दिया है मेरा,

चार साल साथ में मिलकर
हमने खूब बकवास की
याद है मुझको रात रात भर खेली
सारी बाज़ी ताश की ,

' गेम ' ने सबका गेम बजाया
' आधा ' ने पूरा साथ निभाया
' चिकना ' अपनी चिकनाहट में मस्त
' मोटा ' भाई के आगे सारे पस्त,

' बंगाली' कभी नहाये ना
' छोटू ' को चैन कभी आये ना
' क्रन्तिकारी ' ख्यालों में खोया रहे
' बुढवा ' दिन भर सोया रहे,

एक था अपना ' राजकुमार '
नेपाल से वो आया था,
' गोलू ' अपना मस्त था लेकिन
कांग्रेस से खार वो खाया था ,

वो हम लोग कुछ और थे
वो समय कुछ और था
गज़ब वो अपना बेफिक्री
का दौर था .........

जो यादों की बेशकीमती डायरी
मेरे पास छोड़ गए हो
रोज उसमे से एक पन्ना
पढता हूँ ..... , हँसता हूँ ......
आँखें भीग जाती हैं ....
और मैं बस खो जाता हूँ ........