Sunday, September 15, 2013

योद्धा

कठोर कठिन दुर्गम पथ है
माना की जर्जर मेरा रथ है
झुका नहीं हूँ मैं अभी भी, यद्यपि
शरीर स्वेद-रक्त  से लथपथ है

जीवन रण के इस परम सत्य को
हाँ मैंने स्वीकारा है
शक्ति नहीं सामर्थ्य बल पर
रिपुदल को ललकारा है

अस्तित्व के इस यथार्थ युद्ध का
दृढ़ निश्चय ही प्राण तत्व है
कर्म पूर्ति की विषम राह पर
वीरगति ही अमरत्व है।

Wednesday, September 11, 2013

तो फिर बात क्या है

क्या मैं कहूँ की जमाने के हालात क्या हैं
इन्सां हूँ मैं, मुझसे पूछो मेरे जज़्बात क्या हैं 
मिले कोई मुझसे न देखे  मेरा मज़हब, जात क्या है 
हो सके ग़र ये तो फिर बात क्या है। …. 

Thursday, August 29, 2013

पायल

अल्हड मेरी चाल पे
मेरे मन की उछाल पे
छनका  करे  यूँ ही
खनका करे यूँ ही
उड़ती फिरू जो सपनों की नगरी
संग-संग मेरे चले यूँ ही
ना मैं छनकने से रोकूँ ……. 
न ये भटकने से रोके
रिश्ता ऐसा हो अपना
पाँव में पायल के जैसा
……बस कोशिश ये रहे
पायल है.……… पायल ही रहे
क़दमों की बेड़ी  न बने
मुझको रोके नहीं।  

Tuesday, August 13, 2013

फिर फिर सावन आएगा

फिर सावन आया है
फिर मेंढक टर्रायेंगे 
खादी पहन कर भेड़िये 
मेमनों को दुलराएंगे
देश की दुर्गति करने वाले
शान से तिरंगा फहराएंगे
लूट के देश की सुख-संपदा
गीत राष्ट्र -भक्ति के गायेंगे,
भूखी जनता जब कोसेगी
वादों के लड्डू खिलाएंगे
माँ बहन की कसमे खायेंगे
कि, गरीबी (गरीबों ) को मिटायेंगे
स्विस बैंक में नए अकाउंट खुलवायेंगे,
फिर सीमा पार गीदड़ गुर्रायेंगे
और पिंजड़े में बंद शेर हमारे
खादी के कारण मारे जायेंगे,
एक बार फिर पक्ष विपक्ष
जनता को उल्लू बनायेंगे
ऊपर ऊपर झगड़ेंगे
भीतर भीतर माल दबायेंगे,
. .
..
काँधे पे ले अपनी छोटी सी दुनिया
हम फिर  अपना दुखड़ा गायेंगे
बड़े लोग हैं, सब कर सकते हैं
हम आखिर क्या कर पायेंगे

पर अगर आज भी नहीं जागे .....

फिर फिर सावन आएगा
फिर फिर मेंढक टर्रायेंगे
खादी पहन कर भेड़िये 
एक बार फिर मेमनों को चबायेंगे 

Wednesday, July 31, 2013

मायने

जब तक मेरे जेहन   रहा
तू ज़ज्बात बन कर रहा
जुबां तक पहुँचते पहुँचते
 लफ्ज़ बन गया
होठों के रास्ते निकला जो
अल्फाज़ बन हवा में उड़ता फिर रहा
तेरे कानों तक पंहुचा तो
एक आवाज़ हो गया
रिस रिस कर ये जो
तेरे दिल-ओ-दिमाग में भर रहा
तो एक ख्याल हो गया
पर,……
वहां मायने  बदल गए
वहां मतलब बदल गए
तूने शक्ल इक नयी इख्तियार की
कही वो जो मैंने कही ना बात थी
और अब हर इक बात का
सबब तू बन रहा
पर तू तो बस एक ज़ज्बात था
मासूम, निरपराध सा
अब न जाने तू
क्या से क्या बन रहा …

मुकम्मल की तलाश थी
हाथ कुछ भी न आया है
आफताब  की आरज़ू  में
चिराग भी गवाया है 

अख़बार की खबर

मैं हर रोज पैदा होता हूँ
मैं हर रोज मारा जाता हूँ
कभी सीने से लगाया जाता हूँ
कभी टुकड़े टुकड़े फाड़ा जाता हूँ
कुछ कुछ मैं बनता जाता हूँ
कुछ कुछ मैं मिटता जाता हूँ
सुबह को धूप  हूँ तो
रात को अँधेरा बन जाता हूँ
छोटी सी ज़िन्दगी मेरी
छोटा सा मेरा सफ़र
मानो मैं हूँ कोई. …… अख़बार की खबर !